इनकम टैक्स कैसे बचाएं — सैलरी पर टैक्स बचाने के तरीके

सही प्लानिंग से आप कानूनी तौर पर काफ़ी टैक्स बचा सकते हैं। यहाँ जानिए पुरानी और नई टैक्स रिजीम में टैक्स बचाने के सबसे असरदार तरीके।

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पुरानी रिजीम में टैक्स बचत

पुरानी रिजीम की पूरी ताक़त कटौतियों में है, इसलिए यहाँ बचत का मतलब है उन सब को गिनना जो आप पहले से कर रहे हैं। धारा 80C में ₹1.5 लाख तक — PPF, EPF का आपका हिस्सा, ELSS, जीवन बीमा का प्रीमियम, होम लोन का मूलधन और बच्चों की ट्यूशन फीस, ये सब एक ही सीमा में। धारा 80D में स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम, अपने और परिवार के लिए ₹25,000 तक और माता-पिता के लिए अलग से। धारा 24(b) में घर के लोन का ब्याज ₹2 लाख तक। धारा 80CCD(1B) में NPS का अतिरिक्त ₹50,000, जो 80C की सीमा से बाहर है। और किराए पर रहने वालों के लिए HRA की छूट, जो अक्सर इन सबसे बड़ी निकलती है। स्टैंडर्ड डिडक्शन यहाँ ₹50,000 है। इन सबका जोड़ ही तय करता है कि पुरानी रिजीम आपके लिए सस्ती है या नहीं।

नई रिजीम में टैक्स बचत

नई रिजीम में बचत का तरीक़ा उल्टा है — यहाँ कटौतियाँ नहीं, कम दरें ही बचत हैं। ₹4 लाख तक कुछ नहीं लगता, और उसके ऊपर ₹4 लाख के बैंड में 5%, 10%, 15%, 20% और 25% करते हुए ₹24 लाख से ऊपर 30% लगता है। सैलरी वालों को ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है, जो पुरानी रिजीम से ज़्यादा है। सबसे बड़ी राहत धारा 87A की छूट है: ₹60,000 तक, जिससे ₹12 लाख तक की कर योग्य आय पर टैक्स शून्य हो जाता है — यानी लगभग ₹12.75 लाख तक की ग्रॉस सैलरी पर कुछ नहीं बनता। इस सीमा के ठीक ऊपर मार्जिनल राहत भी मिलती है ताकि एक रुपया ज़्यादा कमाने पर टैक्स अचानक बहुत न बढ़े। एक कटौती यहाँ भी बची है — नियोक्ता का NPS अंशदान, धारा 80CCD(2) के तहत।

पहले यह तय करें कि बचाने को कुछ है भी या नहीं

टैक्स बचाने की क़वायद शुरू करने से पहले यह देख लीजिए कि टैक्स बन भी रहा है या नहीं। नई रिजीम में ₹12 लाख तक की कर योग्य आय पर 87A की छूट के बाद देनदारी शून्य हो जाती है, और सैलरी वालों के लिए ₹75,000 के स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद यह लगभग ₹12.75 लाख की ग्रॉस सैलरी बैठती है। इससे नीचे की आय पर टैक्स बचाने के लिए निवेश करने का कोई मतलब नहीं — आप पहले से शून्य पर हैं, और लॉक-इन वाले उत्पाद में पैसा डालकर सिर्फ़ अपनी नक़दी बाँध रहे हैं। इसलिए क्रम यह रखिए: पहले अनुमान लगाइए कि साल भर की आय कितनी रहेगी, फिर देखिए कि किस रिजीम में क्या बनता है, और उसके बाद ही तय कीजिए कि निवेश टैक्स के लिए करना है या अपने लक्ष्य के लिए।

कौन-सी रिजीम आपके लिए सस्ती है

इसका कोई एक जवाब नहीं है और न ही कोई स्थायी नियम — यह हर व्यक्ति के आँकड़ों पर बदलता है और हर साल दोबारा तय होता है। मोटे तौर पर पुरानी रिजीम तभी जीतती है जब आपकी कुल कटौतियाँ काफ़ी बड़ी हों, और व्यवहार में यह आम तौर पर तब होता है जब घर का लोन चल रहा हो और आप किराए पर भी रहते हों, क्योंकि तब 24(b) का ब्याज और HRA दोनों मिलते हैं। सिर्फ़ 80C और 80D भरने भर से पलड़ा शायद ही झुकता है। नई रिजीम का फ़ायदा यह भी है कि कोई काग़ज़ नहीं जुटाना पड़ता और पैसा कहीं बँधता नहीं। सही तरीक़ा एक ही है — दोनों की गणना अपने असली आँकड़ों पर कीजिए, और नौकरी बदलने, घर ख़रीदने या किराया बढ़ने पर दोबारा कीजिए।

निवेश के अलावा भी बचत है

टैक्स बचत का मतलब सिर्फ़ निवेश नहीं है, और यह हिस्सा सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ होता है। सैलरी का ढाँचा ख़ुद एक औज़ार है: नियोक्ता का NPS अंशदान धारा 80CCD(2) में आता है और वह नई रिजीम में भी चलता है, इसलिए ज़्यादा टैक्स वालों के लिए यह सबसे साफ़ बचत है। पुरानी रिजीम में HRA, LTA और कुछ भत्ते सैलरी के भीतर ही छूट देते हैं। इसके अलावा ऐसे ख़र्च हैं जो आप पहले से कर रहे हैं — बच्चों की स्कूल फीस, होम लोन का मूलधन, माता-पिता का स्वास्थ्य बीमा, शिक्षा ऋण का ब्याज जिस पर 80E में कोई ऊपरी सीमा नहीं। और अगर आपकी आय पर टैक्स बनता ही नहीं, तो बैंक में फ़ॉर्म 15G या 15H देकर TDS ही रुकवाया जा सकता है, ताकि पैसा रिफंड के इंतज़ार में फँसे नहीं।

वे कटौतियाँ जो लोग भूल जाते हैं

पुरानी रिजीम में 80C के बाहर भी काफ़ी कुछ है और सीमा भर जाने के बाद वही काम आता है। शिक्षा ऋण का ब्याज धारा 80E में, बिना किसी ऊपरी सीमा के, तय वर्षों तक — यह उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जिनके बच्चे उच्च शिक्षा में हैं। मान्यता प्राप्त संस्थाओं को दिया गया दान 80G में, हालाँकि रसीद और संस्था का पंजीकरण देख लेना ज़रूरी है। बचत खाते का ब्याज 80TTA में, और वरिष्ठ नागरिकों के लिए 80TTB में जिसकी सीमा ज़्यादा है और उसमें FD का ब्याज भी आता है। गंभीर बीमारी के इलाज पर 80DDB, और दिव्यांग आश्रित की देखभाल पर 80DD। माता-पिता का स्वास्थ्य बीमा 80D में अपनी सीमा से अलग गिना जाता है, और वे वरिष्ठ नागरिक हों तो सीमा और बढ़ जाती है।

जो नहीं करना चाहिए

बचत और गड़बड़ी के बीच की रेखा साफ़ है, और उसे पार करना महँगा पड़ता है। ऐसे किराए की रसीदें मत बनवाइए जो चुकाया ही न गया हो — मकान मालिक का PAN, बैंक से भुगतान और उनकी अपनी आय, तीनों मिलाकर देखे जाते हैं। जिस दान की रसीद ख़रीदी गई हो उसका दावा मत कीजिए; 80G के दावे अब संस्था की अपनी रिपोर्टिंग से मिलाए जाते हैं। ऐसी कटौती मत लीजिए जिसका प्रमाण आपके पास न हो, क्योंकि दस्तावेज़ रिटर्न के साथ भेजे नहीं जाते पर बाद में माँगे जा सकते हैं। और AIS में दिख रही आय को छोड़ मत दीजिए — बैंक ब्याज, डिविडेंड और शेयरों की बिक्री सब वहाँ दर्ज होते हैं, इसलिए भूल जाना छिपाना नहीं, बस देर से पकड़ा जाना है, जिसमें ब्याज और जुर्माना दोनों जुड़ते हैं।

एडवांस टैक्स भूल जाना महँगा पड़ता है

अगर TDS कटने के बाद भी आपकी कुल देनदारी ₹10,000 या उससे ज़्यादा बनती है, तो टैक्स साल के दौरान ही चार किस्तों में भरना होता है — 15 जून तक 15%, 15 सितंबर तक 45%, 15 दिसंबर तक 75% और 15 मार्च तक पूरा, और ये आँकड़े संचयी हैं। यह बात सैलरी वालों को कम परेशान करती है क्योंकि नियोक्ता TDS काट लेता है, पर फ्रीलांसर, कारोबारी, किराए की आय वाले और वे लोग जिन्होंने शेयर या संपत्ति बेची है — इन सबके लिए यह सीधे लागू होती है। चूक पर तीन अलग धाराओं में 1% प्रति माह ब्याज लगता है: देर से रिटर्न भरने पर 234A, कुल एडवांस टैक्स 90% से कम रहने पर 234B, और किसी किस्त के छूटने पर 234C। महीने का हिस्सा भी पूरा महीना गिना जाता है, इसलिए एक दिन की देरी तीस दिन जितनी पड़ती है।

रिटर्न भरने के बाद का काम

रिटर्न भर देना आख़िरी क़दम नहीं है। बिना सत्यापन के भरा गया रिटर्न ऐसा माना जाता है जैसे भरा ही न गया हो, और उसके लिए आपके पास तीस दिन होते हैं — आधार OTP से यह काम मिनटों में हो जाता है। इसके बाद विभाग रिटर्न प्रोसेस करता है और धारा 143(1) की सूचना भेजता है, जो कोई जाँच या आरोप नहीं, बस उनकी गणना और आपकी गणना का मिलान है। उसमें रिफंड दिख रहा हो तो कुछ करने की ज़रूरत नहीं; मांग दिख रही हो तो पहले अपने आँकड़ों से मिलाइए, क्योंकि सूचना ग़लत भी हो सकती है और उस स्थिति में रास्ता धारा 154 का सुधार आवेदन है। रिफंड उसी बैंक खाते में आता है जो पोर्टल पर पूर्व-सत्यापित हो, इसलिए खाता बदला हो तो पहले वहाँ अपडेट कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या नई रिजीम में कोई कटौती मिलती है?

बहुत सीमित। सैलरी वालों को ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है और नियोक्ता का NPS अंशदान धारा 80CCD(2) में चलता रहता है। 80C, 80D, HRA और होम लोन के ब्याज जैसी कटौतियाँ नहीं मिलतीं — नई रिजीम का फ़ायदा कम दरों और ₹12 लाख तक की छूट में है, कटौतियों में नहीं।

सैलरी वालों के लिए सबसे अच्छा टैक्स सेविंग ऑप्शन क्या है?

पुरानी रिजीम में ELSS (80C) + NPS (80CCD(1B)) + हेल्थ इंश्योरेंस (80D) एक मज़बूत कॉम्बिनेशन है। नई रिजीम में एम्प्लॉयर से NPS को 80CCD(2) में रूट करवाएँ।

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यह सामान्य जानकारी है, पेशेवर सलाह नहीं। नियम बदलते रहते हैं और आपके तथ्यों पर निर्भर करते हैं — कार्रवाई से पहले किसी लाइसेंस प्राप्त CA या वकील से पुष्टि करें।